दो मित्रों के त्याग, समर्पण और आदर्श की भावपूर्ण कहानी का उदाहरण है दोस्ती

भारत भवन में आयोजित पांच दिवसीय बाल फिल्म समारोह का हुआ समापन
भोपाल। भारत भवन में आयोजित बाल फिल्म समारोह का समापन मंगलवार को हुआ। पांच दिवसीय इस फिल्म समारोह के अंतिम दिन सत्येन बोस द्वारा निर्देशित फिल्म दोस्ती का प्रदर्शन हुआ। वर्ष 1964 में रिलीज हुई फिल्म दो दोस्तों की अटूट दोस्ती पर आधारित है। बीना भट्ट की कहानी पर बनी फिल्म की पटकथा और संवाद गोविंद मूनिस ने लिखे थे। नैतिकता, आदर्श और दोस्ती की मिसाल के रूप में आज भी यह फिल्म याद की जाती है। फिल्म के गीत काफी लोकप्रिय हुए थे जिन्हें लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों को कर्णप्रिय धुनों से सजाया था। फिल्म दिव्यांग और आंखों से देखने में अक्षम लडके की दोस्ती, त्याग, समर्पण और आदर्श की भावपूर्ण कहानी है। परस्पर सौहार्द और लगाव से वे किस तरह से जिंदगी की मुश्किलों का मुकाबला करते हैं इसका प्रदर्शन बहुत ही खूबसूरती के साथ किया गया। फिल्म में संजय ख़ान, लीला मिश्रा, नाना पालसिकर, लीला चिटनिस, अभिभट्टाचार्य, मूलचन्द मुख्य किरदार में दिखाई दिये।


एक दूसरे का सहारा बनते हैं
फिल्म की पृष्ठभूमि में मिल मजदूर और उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद होने वाली समस्याएं हैं। फिल्म मजदूर आंदोलन की तरफ मुडने के बजाय नैतिकता व सामाजिकता की राह लेते हैं। मिल मजदूर गुप्ता की मृत्यु काम के दौरान हो जाती है। उनकी पत्नी और इकलौते बेटे रामनाथ को उम्मीद है कि कंपनी से उचित मुआवजा मिल जाएगा। कुछ दिनों बाद पता चलता है कि कंपनी मुआवजे के तौर पर कुछ भी नहीं देगी। इस खबर से हुई घबराहट में पत्नी के पांव सीढियों से फिसल जाते हैं। बेटा रामनाथ डॉक्टर को बुलाने के लिए भागता है और उसका एक्सीडेंट हो जाता है। इधर बीवी की मौत होती है और उधर रामनाथ की टांग काटनी पडती है। रामनाथ को किराये के घर से निकलना पड़ता है। वह मुंबई की सड़कों पर आश्रय और आजीविका की तलाश में भटक रहा होता है कि उसकी मुलाकात मोहन से होती है। मोहन आंखों से देखने में अक्षम है। मोहन को अपनी बहन मीना की तलाश है, जो नर्स का काम करती है। इस बीच उनकी दोस्ती बीमार लडकी मंजुला से होती है। मोहन और रामनाथ को उम्मीद है कि मंजुला से आर्थिक मदद मिल जाएगी तो रामनाथ की पढाई पूरी हो जाएगी। इस फिल्म में कुछ भी मनचाहा नहीं होता, लेकिन विषम परिस्थितियों में जिस तरह से रामनाथ और मोहन की दोस्ती बनी रहती है, वह उल्लेखनीय है। वे एक-दूसरे का सहारा बने रहते हैं।

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